पतंजलि योगसूत्र। दूसरी बैठक।।

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दूसरी बैठक।
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तप: स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोग:।।१।।

क्रियायोग एक प्रायोगिक, प्राथमिक योग है और वह संगठित हुआ है---सहज संयम (तप), स्वाध्याय और ईश्वर के प्रति समर्पण से।
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पहला शब्द है---सहज-संयम।
स्व-पीड़कों ने सहज-संयम को स्व-पीड़ा में बदल दिया। वे सोचते हैं कि जितनी ज्यादा पीड़ा तुम देह को पहुंचाते हो, उतने ज्यादा तुम आध्यात्मिक बनते हो। यही समझ होती है एक स्व-पीड़क की।
देह को पीड़ा पहुंचाना कोई मार्ग नहीं । उत्पीड़न आक्रामक होता है। चाहे तुम दूसरों को पीड़ा पहुंचाओ या कि स्वयं को, यह बात ही आक्रामक होती है; और आक्रामकता कभी धार्मिक नहीं हो सकती है।
पहली बात: ईश्वर ने क्यों दिया तुम्हें शरीर? उत्पीड़न के लिये नहीं, बल्कि इसके विपरीत, संवेदनाओं को, संवेदनशीलता को, इंद्रियों को--आनंदित होने के लिये---उत्पीड़ित होने के लिये नहीं। संवेदनशीलता के द्वारा जागरूकता विकसित होती है।
एक मुरदा शरीर के द्वारा तुम कैसे अनुभव कर सकते हो अस्तित्व के आशीष को? कैसे तुम अनुभव कर सकते हो, अनुग्रह की वर्षा को जो कि हर क्षण घट रही है। धार्मिक आदमी बनने के लिये कम की नहीं ज्यादा संवेदनशीलता की जरूरत होती है, क्योंकि उतने ही अधिक भगवत्ता तुम हर कहीं देख पाओगे। संवेदनशीलता बन जाती है एक आंख, एक खुलापन। जब तुम पूर्णतया संवेदनशील हो जाते हो, तो हवा का कोई हल्का सा झोंका भी तुम्हें छू लेता है, और तुम्हें दे जाता है कोई संदेश। यह निर्भर करता है तुम्हारी संवेदनशीलता पर।
जीवन अधिक होता है यदि तुम संवेदनशील होते हो; जीवन कम होता है यदि तुम कम संवेदनशील होते हो। स्वयं को पीड़ा पहुंचाने वालो ने किया है ऐसा। साधना एक प्रयास बन जाती है शरीर और संवेदनशीलता को मारने का।
तप का मतलब उत्पीड़न नहीं है; तप का मतलब है सहज जीवन, एक सरल जीवन। क्यों सरल जीवन? क्योंकि जीवन जितना अधिक जटिल होता है, उतने ही कम संवेदनशील होओगे तुम। एक धनी कम संवेदनशील होता है, निर्धन की अपेक्षा। धन एकत्रित करने का प्रयास ही उसे कम संवेदनशील बना चुका होता है।
शरीर को मारने के दो तरीके हैं: एक तरीका है स्व-पीड़क का, दूसरा तरीका है धनपति का जो कि धन और कूड़ा-करकट इकट्ठा करता रहता है। वही धीरे-धीरे बाधा बन जाता है। और वह कहीं बढ़ नहीं सकता, वह देख नहीं सकता, वह सुन नहीं सकता, वह स्वाद नहीं ले सकता, वह सूंघ नहीं सकता।
सरल जीवन का अर्थ होता है बिना उलझाव का जीवन। ध्यान रहे, यह कोई गरीबी का पोषण नहीं, क्योंकि यदि तुम गरीबी को पोषित करते हो प्रयास द्वारा, तो फिर वह पोषण ही तुम्हें मार देगा।
सहज जीवन एक गहरी समझ का जीवन होता है, जानबूझकर बढ़ाने-सजाने का नहीं। वह गरीब होने अभ्यास नहीं। गरीबी को अपना उद्देश्य मत बनाओ और उसे बढ़ाने की कोशिश मत करो। जरा सा समझ भर लो कि जितनस ज्यादा सहज, निर्भार तुम्हारा शरीर और मन होता है, उतने ज्यादा तुम प्रवेश कर सकते हो अस्तित्व में। धनपति के रास्ते में सदा उसका बैंक-खाता आ जमता है।
तुम देखते हो इंग्लैंड की महारानी को, एलिजाबेथ को? वह हाथ तक नहीं मिला सकती बिना दस्ताने के। रानी, राजा घेरे में बंद हुए जीते हैं; यह कोई हाथ की बात नहीं। वह मात्र प्रतीक है, बताने के लिये कि रानी का जीवन दफन हो गया है; वह जीवंत नहीं है।
मध्ययुग में ऐसा विचार चलता था, यूरोप में, कि राजाओं रानियों की दो टांगें नहीं होती हैं, क्योंकि किसी नॆ कभी उन्हें निरावरण देखा ही नहीं होता था। वे मानव से एक दूरी पर रहे होते थे।
अहंकार सदा दूरी पर रहने की कोशिश करता है, और दूरी तुम्हें संवेदन शून्य बना देती है। तुम जीवन के ज्यादा निकट नहीं जा सकते; तुम दिखावा कर रहे होते हो कि तुम जीवन से ज्यादा ऊंचे हो,जीवन से ज्यादा महान हो, जीवन से ज्यादा बड़े हो। दूरी निर्मित करनी पड़ती है, और केवल तभी तुम जीवन से ज्यादा बड़े होने की बात का दिखावा कर सकते हो। लेकिन जीवन तो कुछ नहीं गवां रहा, तुम्हारी इस मूढ़ता द्वारा तुम्हीं और ज्यादा संवेदनशून्य बनते जा रहे हो। जीवन मांग करता है और ज्यादा जीवंत होने की।

जब पतंजलि कहते हैं 'तप', तो उसका मतलब है---सरल, सहज होओ, सहजता को गढ़ो मत। क्योंकि गढ़ी हुई सरलता, सरलता नहीं होती है।
सहजता का, सादगी का अभ्यास नहीं किया जा सकता है। तुम्हें केवल ध्यान से देखना है जीवन को और समझ लेना है कि जितने ज्यादा तुम जटिल होते हो, उतने ज्यादा कम संवेदनशील होते जाते हो। दिन आता है जब तुम तुम्हारे अस्तित्व की जड़ों के प्रति संवेदनशील हो जाते हो, अचानक तुम फिर बचते नहीं, तुम होते हो मात्र एक संवेदना, एक संवेदनशीलता। तुम अब नहीं रहते, तुम होते हो केवल एक जागरूकता। और हर चीज सुंदर होती है, कुछ भी मृत नहीं होता।

तुम्हारी संवेदन-शीलता के कारण ही, संसार बदल जाता है। अंतिम घड़ी में जब संवेदनशीलता अपनी संपूर्णता तक पहुंचती है, अपने परम शिखर पर, तो संसार खो जाता है, वहां होता है परमात्मा। परमात्मा सदा से ही है वहां केवल तुम ही संवेदनशील न थे।

सहज संयम है: सरल-सहज जीवन, समझ भरा एक जीवन। तुम्हें झोपड़ी में रहने की कोई जरूरत नहीं, तुम्हें नग्न हो जाने की कोई जरूरत नहीं। एक समझ के साथ सरलता-सहजता से रह सकते हो। गरीबी नहीं समझ मदद देगी।
पश्चिम में हिप्पियों के साथ और उसी तरह के और लोगों के साथ यही हो रहा है। वे वही गलती कर रहे हैं जो भारत एक लम्बे समय से करता चला आ रहा है। अतीत में भारत परिचित रहा है इस प्रकार के हिप्पियों से। जितने गंदे से गंदे जीवन संभव है उन्हें जिया है उन्होंने। केवल तप के नाम पर, उन्होंने स्नान नहीं किये, क्योंकि उन्होंने महसूस किया, 'क्यों फिक्र करनी और क्यों सजाना शरीर को?'
जानते हो न कि जैन मुनि नहाते नहीं हैं? तुम बैठ नहीं सकते हो उनके पास; उनके पास से बदबू आती है। वे अपने दांत साफ नहीं करते। बदबू उठती है उनके मुंह से। और इसे तप-संयम माना जाता है, क्योंकि वे कहते हैं, 'नहाना या शरीर साफ रखना भी भौतिकवादी होना है। लेकिन इस तरह का दृष्टिकोण तो ऐसा हुआ कि दूसरी अति की ओर सरकना, एक मूढ़ता से दूसरी मूढ़ता तक बढ़ना।
ऐसे लोग भी हैं जो चौबीस घंटे शरीर के साथ ही व्यस्त रहते हैं। तुम खोज सकते हो ऐसी स्त्रियों को जो दर्पण के सामने घंटों गवांती रहती हैं। स्वच्छ देह अच्छी होती है, लेकिन उसे साफ करते रहने की एक निरंतर सनक---वह तो पागलपन है। दुनिया के लगभग आधे उद्योग जुटे हुए हैं देह की साज-सज्जा को लेकर ही; पाउडर हैं, इत्र हैं, साबुन हैं।
तुम बहुत संवेदनशील हो गये हो तभी तो नशे इतने महत्वपूर्ण हो गये हैं। अब लगता है कि रसायनिक नशों के बिना तुम संवेदनशील हो ही नहीं सकते। अन्यथा एक सहज-सादा व्यक्ति तो इतना संवेदनशील होता है कि उसे जरूरत ही नहीं होती नशों की। जो तुम अनुभव करते हो नशों के द्वारा, वह अनुभव कर लेता हैं केवल अपनी संवेदनशीलता के द्वारा ही।

एक सीधा-सादा आदमी जीता है पल प्रतिपल; यह दिन अपने में पर्याप्त होता है, और आने वाला कल अपना खयाल अपने आप रख लेगा। जीसस फिर-फिर कहते हैं, 'जरा बाग में लिली के फूलों को देखना, कितने सुंदर हैं! वे आने वाले कल की फिक्र नहीं करते। सोलोमन भी अपनी सर्वाधिक महिमा-मंडित घड़ियों में इतना सुंदर न था जितने कि ये बाग के साधारण लिली के फूल!'

सादगी का अर्थ है: तुम्हारी आवश्यकताओं तक आ जाओ; इच्छाएं पागल होती हैं। आवश्यकताएं स्वाभाविक होती हैं। और तुम आनंदित होओगे। और एक आनंदित व्यक्ति धार्मिक होने के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता। प्रार्थना तो एक अनुग्रह का भाव है, शिकायत नहीं ।

केवल एक प्रसन्न व्यक्ति ही अनुगृहीत हो सकता है; उसका पूरा हृदय पुकारता है एक समग्र अहोभाव में; उसकी आंखों में आंसू आ जाते हैं, क्योंकि परमात्मा ने उसे इतना ज्यादा दिया है बिना उसके मांगे ही। पल भर के लिये श्वांस लेना मात्र ही पर्याप्त होता है, पर्याप्त से कहीं ज्यादा। जीवन तो इतना आशीषपूर्ण---लेकिन एक अप्रसन्न व्यक्ति इसे समझ नहीं सकता।

इसलिए ध्यान रहे, जितने ज्यादा तुम कब्बा जमाने की वृत्ति से जुड़ते हो, उतने ही कम प्रसन्न होओगे तुम। जितने कम प्रसन्न होते हो तुम, उतने ही दूर हो जाओगे परमात्मा से, प्रार्थना से, अनुग्रह के भाव से। सीधे-सहज होओ। आवश्यक बातों सहित जीओ और भूल जाओ आकांक्षाओं के बारे में; वे मन की कल्पनाएँ हैं, झील की तरंगें हैं। वे केवल अशांत ही करती हैं तुम्हें; वे किसी संतोष की ओर तुम्हें नहीं ले जा सकती हैं।

'...सहज-संयम, स्वाध्याय और ईश्वर के प्रति समर्पण... ।'
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अभी इतना ही। शेष आगे तीसरी बैठक में ।
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।।ॐ।।
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