पतंजलि योगसूत्र। तीसरी बैठक।
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तप:स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोग:।।१।।
क्रियायोग एक प्रायोगिक, प्राथमिक योग है और वह संघटित हुआ है---सहज संयम (तप), स्वाध्याय और ईश्वर के प्रति समर्पण से।
. . . . . . . . . . . . . . . . . . . (योगसूत्र, साधनपाद)
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'. . . सहज-संयम, स्वाध्याय और ईश्वर के प्रति समर्पण. . .।'
ये सब अंतर्संबंधित हैं। यदि तुम सहज होते हो तो तुम स्वयं का निरीक्षण कर पाओगे। एक जटिल आदमी स्वयं का निरीक्षण नहीं कर सकता है, क्योंकि वह बटा हुआ होता है, उसके चारों ओर बहुत सारी चीजें होती हैं; बहुत सारे विचार, और बहुत सारी समस्याएं उठ रही होती हैं। उस भीड़ में कठिन होता है स्वाध्याय को पाना। संयमी आदमी बैठता है, देखता है अपनी ओर। बंद कर लेता है अपनी आंखें; अपनी अंतस सत्ता को ध्यान से देखता है। कहीं कोई भीड़ नहीं, कुछ ज्यादा करने को नहीं । सहज बातों की एक गुणवत्ता होती है कि उन्हें करते समय भी तुम स्वयं का अध्ययन कर सकते हो।
पतंजलि जो अर्थ करते हैं स्वाध्याय का, वही अर्थ करते हैं गुरजिएफ स्व-स्मरण का, या जिसे बुद्ध कहते हैं सम्यक-बोध, या जिसे जीससकहते हैं ज्यादा सजग हो जाना, या कि जो अर्थ कृष्णमूर्ति का होता है, वे सब कहे चले जाते हैं ज्यादा सजग हो जाने की बात। जब तुम्हारे पास करने को कुछ नहीं होता, दिन भर की सहज बातें समाप्त हो गयी, तो कहां सरकेगी ऊर्जा? क्या होगा तुम्हारी ऊर्जा का?
बिलकुल अभी तो तुम उथले ही रहते हो सदा, तुम्हारी कमतर ऊर्जा में, क्योंकि ऊर्जा के लिये इतनी ज्यादा व्यस्ततायें बनी रहती हैं। तुम्हारे पास पर्याप्त ऊर्जा का उमड़ाव कभी नहीं रहता और बिना किसी ऊर्जा के जागरूक होने की कोई संभावना नहीं होती, क्योंकि जागरूकता ऊर्जा का सूक्ष्मतम रूपांतरण है। वह तुम्हारी ऊर्जा का परम रूप है।
यदि तुम्हारे पास पर्याप्त परिपूर्ण ऊर्जा नहीं होती, तो तुम जागरूक नहीं हो सकते। सतही ऊर्जा के बिंदु पर, निम्न ऊर्जा-तल पर, तुम जागरूक नहीं हो सकते; परिपूर्ण ऊर्जा की आवश्यकता होती है। तुम शांत बैठे हुए होते हो; ऊर्जा सरकती है सूक्ष्मतम परतों तक---वह और-और ज्यादा ऊंचे जाती है, वह संचित होती है, वह शिखर बन जाती है, एक ऊर्जा स्तम्भ। अब तुम स्वयं का निरीक्षण करते हो। तुम्हारे विचारों, भावनाओं, अनुभूतियों के सब से अधिक सूक्ष्म तलों पर भी तुम ध्यान कर सकते हो।
'...स्वाध्याय और ईश्वर के प्रति समर्पण... ।'
जब कभी तुम ध्यान करते हो, तब तुम वहां होते ही नहीं हो, तब सहज संयम ले जाता है स्वाध्याय की ओर, स्वाध्याय ले जाता है निरहंकारिता की ओर, क्योंकि तुम वहां होते नहीं। जितना ज्यादा तुम जानते हो स्वयं को, उससे कम तुम होते हो। केवल अज्ञानी भरे रहते हैं अपने से। प्रज्ञावान होते ही नहीं। वे होते हैं एक शून्यता की भांति, वे होते हैं विशाल आकाश की भांति। जितने ज्यादा अजागरूक होते हो, उतने ज्यादा तुम मौजूद होते हो। जितने ज्यादा तुम जागरूक होते हो, उतने ही कम तुम स्वयं बने रहते हो। जब तुम पूर्णतया जागरूक हो जाते हो, तब तुम बचते ही नहीं। और फिर अहंकार छूटता है, जैसे कि सांप सरक जाता है केंचुली के बाहर। तब घटता है परमात्मा के प्रति समर्पण। तुम नहीं कर सकते परमात्मा के प्रति समर्पण, क्योंकि तुम्हीं होते हो अड़चन। 'तुम' ही हो गैर-समर्पण। जब तुम नहीं होते हो---समर्पण घटता है। तो जरा ध्यान में रख लेना इसे: तुम नहीं कर सकते समर्पण। यह तुम्हारी ओर से किया गया कोई प्रयास नहीं हो सकता है---यह बात असंभव होती है।
तुम केवल एक बात कर सकते हो, जिसे पतंजलि कह रहे हैं: आडंबरहीन बनो; सहज-सरल हो जाओ। इतनी ऊर्जा बचती है तब, जो कि सहज ही, स्वयं एक जागरूकता बन जाती है और जागरूकता के मौजूद होते ही तुम मौजूद नहीं रहते। अचानक तुम पाते हो कि समर्पण घट गया। परमात्मा के प्रति समर्पण करना तुम्हारे भीतर की गैर-अहंकार की अवस्था है। यदि प्रयास होता है तो वह समर्पण नहीं होता है।
समर्पण एक बोध है। जब तुम जागरूक होते हो और बोध की ज्योति-शिखा ऊंची प्रज्वलित हो रही होती है, अचानक तुम जान लेते हो कि अंधकार वहां नहीं है। तुम समर्पित हो गये हो। वह एक उदघटित घटना होती है---एक बोध। अचानक तुम हैरान हो जाते हो! तुम अनुपस्थित हो और परमात्मा मौजूद है। तुम्हारी अनुपस्थिति में परमात्मा है, तुम्हारी उपस्थित में केवल दुख मौजूद होता है। तुम्हारी उपुपस्थिति से कुछ संभव नहीं होता, तुम्हारी अनुपस्थिति में सारी अपरिसीमता संभव हो जाती है। ये अंतर्संबंधित बातें होती हैं: सहज-संयम, स्वाध्याय और ईश्वर के प्रति समर्पण।
'क्रियायोग का अभ्यास, क्लेश को घटा देता है और समाधि की ओर ले जाता है।'
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अभी बस इतना ही।
शेष आगे चौथी-बैठक में।
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।।ॐ।।
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तप:स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोग:।।१।।
क्रियायोग एक प्रायोगिक, प्राथमिक योग है और वह संघटित हुआ है---सहज संयम (तप), स्वाध्याय और ईश्वर के प्रति समर्पण से।
. . . . . . . . . . . . . . . . . . . (योगसूत्र, साधनपाद)
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'. . . सहज-संयम, स्वाध्याय और ईश्वर के प्रति समर्पण. . .।'
ये सब अंतर्संबंधित हैं। यदि तुम सहज होते हो तो तुम स्वयं का निरीक्षण कर पाओगे। एक जटिल आदमी स्वयं का निरीक्षण नहीं कर सकता है, क्योंकि वह बटा हुआ होता है, उसके चारों ओर बहुत सारी चीजें होती हैं; बहुत सारे विचार, और बहुत सारी समस्याएं उठ रही होती हैं। उस भीड़ में कठिन होता है स्वाध्याय को पाना। संयमी आदमी बैठता है, देखता है अपनी ओर। बंद कर लेता है अपनी आंखें; अपनी अंतस सत्ता को ध्यान से देखता है। कहीं कोई भीड़ नहीं, कुछ ज्यादा करने को नहीं । सहज बातों की एक गुणवत्ता होती है कि उन्हें करते समय भी तुम स्वयं का अध्ययन कर सकते हो।
पतंजलि जो अर्थ करते हैं स्वाध्याय का, वही अर्थ करते हैं गुरजिएफ स्व-स्मरण का, या जिसे बुद्ध कहते हैं सम्यक-बोध, या जिसे जीससकहते हैं ज्यादा सजग हो जाना, या कि जो अर्थ कृष्णमूर्ति का होता है, वे सब कहे चले जाते हैं ज्यादा सजग हो जाने की बात। जब तुम्हारे पास करने को कुछ नहीं होता, दिन भर की सहज बातें समाप्त हो गयी, तो कहां सरकेगी ऊर्जा? क्या होगा तुम्हारी ऊर्जा का?
बिलकुल अभी तो तुम उथले ही रहते हो सदा, तुम्हारी कमतर ऊर्जा में, क्योंकि ऊर्जा के लिये इतनी ज्यादा व्यस्ततायें बनी रहती हैं। तुम्हारे पास पर्याप्त ऊर्जा का उमड़ाव कभी नहीं रहता और बिना किसी ऊर्जा के जागरूक होने की कोई संभावना नहीं होती, क्योंकि जागरूकता ऊर्जा का सूक्ष्मतम रूपांतरण है। वह तुम्हारी ऊर्जा का परम रूप है।
यदि तुम्हारे पास पर्याप्त परिपूर्ण ऊर्जा नहीं होती, तो तुम जागरूक नहीं हो सकते। सतही ऊर्जा के बिंदु पर, निम्न ऊर्जा-तल पर, तुम जागरूक नहीं हो सकते; परिपूर्ण ऊर्जा की आवश्यकता होती है। तुम शांत बैठे हुए होते हो; ऊर्जा सरकती है सूक्ष्मतम परतों तक---वह और-और ज्यादा ऊंचे जाती है, वह संचित होती है, वह शिखर बन जाती है, एक ऊर्जा स्तम्भ। अब तुम स्वयं का निरीक्षण करते हो। तुम्हारे विचारों, भावनाओं, अनुभूतियों के सब से अधिक सूक्ष्म तलों पर भी तुम ध्यान कर सकते हो।
'...स्वाध्याय और ईश्वर के प्रति समर्पण... ।'
जब कभी तुम ध्यान करते हो, तब तुम वहां होते ही नहीं हो, तब सहज संयम ले जाता है स्वाध्याय की ओर, स्वाध्याय ले जाता है निरहंकारिता की ओर, क्योंकि तुम वहां होते नहीं। जितना ज्यादा तुम जानते हो स्वयं को, उससे कम तुम होते हो। केवल अज्ञानी भरे रहते हैं अपने से। प्रज्ञावान होते ही नहीं। वे होते हैं एक शून्यता की भांति, वे होते हैं विशाल आकाश की भांति। जितने ज्यादा अजागरूक होते हो, उतने ज्यादा तुम मौजूद होते हो। जितने ज्यादा तुम जागरूक होते हो, उतने ही कम तुम स्वयं बने रहते हो। जब तुम पूर्णतया जागरूक हो जाते हो, तब तुम बचते ही नहीं। और फिर अहंकार छूटता है, जैसे कि सांप सरक जाता है केंचुली के बाहर। तब घटता है परमात्मा के प्रति समर्पण। तुम नहीं कर सकते परमात्मा के प्रति समर्पण, क्योंकि तुम्हीं होते हो अड़चन। 'तुम' ही हो गैर-समर्पण। जब तुम नहीं होते हो---समर्पण घटता है। तो जरा ध्यान में रख लेना इसे: तुम नहीं कर सकते समर्पण। यह तुम्हारी ओर से किया गया कोई प्रयास नहीं हो सकता है---यह बात असंभव होती है।
तुम केवल एक बात कर सकते हो, जिसे पतंजलि कह रहे हैं: आडंबरहीन बनो; सहज-सरल हो जाओ। इतनी ऊर्जा बचती है तब, जो कि सहज ही, स्वयं एक जागरूकता बन जाती है और जागरूकता के मौजूद होते ही तुम मौजूद नहीं रहते। अचानक तुम पाते हो कि समर्पण घट गया। परमात्मा के प्रति समर्पण करना तुम्हारे भीतर की गैर-अहंकार की अवस्था है। यदि प्रयास होता है तो वह समर्पण नहीं होता है।
समर्पण एक बोध है। जब तुम जागरूक होते हो और बोध की ज्योति-शिखा ऊंची प्रज्वलित हो रही होती है, अचानक तुम जान लेते हो कि अंधकार वहां नहीं है। तुम समर्पित हो गये हो। वह एक उदघटित घटना होती है---एक बोध। अचानक तुम हैरान हो जाते हो! तुम अनुपस्थित हो और परमात्मा मौजूद है। तुम्हारी अनुपस्थिति में परमात्मा है, तुम्हारी उपस्थित में केवल दुख मौजूद होता है। तुम्हारी उपुपस्थिति से कुछ संभव नहीं होता, तुम्हारी अनुपस्थिति में सारी अपरिसीमता संभव हो जाती है। ये अंतर्संबंधित बातें होती हैं: सहज-संयम, स्वाध्याय और ईश्वर के प्रति समर्पण।
'क्रियायोग का अभ्यास, क्लेश को घटा देता है और समाधि की ओर ले जाता है।'
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अभी बस इतना ही।
शेष आगे चौथी-बैठक में।
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