पतंजलि योगसूत्र---चौथी बैठक।
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तप:स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोग:।।१।।
क्रियायोग एक प्रायोगिक, प्राथमिक योग है और वह संगठित हुआ है---सहज संयम (तप), स्वाध्याय और ईश्वर के प्रति समर्पण से।
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समाधिभावनार्थ: क्लेशतनूकरणार्थश्च।।२।।
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क्रियायोग का अभ्यास, क्लेश को घटा देता है और समाधि की ओर ले जाता है।
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अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशा: क्लेशा:।।३।।
दुख उत्पन्न होने के कारण हैं: जागरूकता की कमी, अहंकार, मोह, घृणा, जीवन से चिपके रहना और मृत्यु-भय।
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अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम्।।४।।
चाहे वे प्रसुप्तता की, क्षीणता की, प्रत्यावर्तन की या फैलाव की अवस्थाओं में हो, दुख के दूसरे सभी कारण क्रियांवित होते हैं---जागरूकता के अभाव द्वारा ही।
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ये तीन चरण दुख घटाते हैं और तुम्हें समाधि की ओर ले जाते हैं, परम की ओर, जिसके बाद कोई चीज अस्तित्व नहीं रखती है। जब तुम परमात्मा के प्रति समर्पित होते हो, परमात्मा हो जाते हो; वही होती है समाधि।
दुख उत्पन्न होने के कारण हैं: जागरूकता की कमी, अहंकार, मोह, घृणा, जीवन से चिपके रहना और मृत्यु-भय।
वस्तुतः केवल अहंकार ही होता है कारण। आत्म-जागरूकता की कमी अहंकार है। तुम स्वयं से कभी मिले ही नहीं; और तुम सोचते हो कि तुम हो। यह बात सब प्रकार के दुख निर्मित करती है।
'...अहंकार, उन चीजों के प्रति आकर्षण है जो व्यर्थ होती हैं, द्वेष, घृणा---जो कि मोह का, दूसरा छोर है---जीवन से चिपकना और मृत्यु-भय।'
तुम जीवन से चिपकते हो क्योंकि तुम जानते नहीं कि जीवन क्या है। जीवन शाश्वत है---क्यों चिपकना? वह चलता जा रहा है और कभी ठहर सकता नहीं । तुम उससे चिपककर अनावश्यक रूप से स्वयं को तकलीफ देते हो।
जीवन अनन्त है। कोई मरता नहीं है कभी; कोई मर नहीं सकता है कभी। जो कुछ अस्तित्व में है वह अस्तित्व रखेगा, वह जा नहीं सकता है अस्तित्व के बाहर। अस्तित्व समग्र होता है। हर चीज बनी रहती है---भाव-दशाएं बदलती हैं, आकार बदलते हैं, नाम बदलते हैं।
यही है जिसे हिंदू कहते हैं---'नामरूप'। रूपाकार और नाम बदल जाते हैं, वरना तो हर कोई बना रहता है, हर चीज बनी रहती है।
दुख उत्पन्न होने के कारण हैं: जागरूकता का अभाव, अहंकार, मोह, घृणा, जीवन से चिपके रहना और मृत्यु-भय।
चाहे वे प्रसुप्तता की, क्षीणता की, प्रत्यावर्तन की या फैलाव की अवस्थाओं में हो, दुख के दूसरे सभी कारण क्रियान्वित होते हैं जागरूकता के अभाव द्वारा ही।
दुख के कारणों के बहुत से रूप हो सकते हैं; वे बीजों के रूप में हो सकते हैं। तुम अपना दुख उठाए चल सकते हो बीज रूप में। किसी खास स्थित में पानी धूप पाकर वह बीज प्रस्फुटित हो जायेगा। तो कयी वर्षों तक तुम्हें कोई लालच नहीं और अचानक एक दिन जब ठीक अवसर आ बनता है, तो लालच मौजूद हो जाता है।
प्रेम में तुम सुख अनुभव करते हो, घृणा में तुम दुख अनुभव करते हो; लेकिन प्रेम और घृणा एक ही ऊर्जा की बारी-बारी से आने वाली दो घटनाएँ हैं। कयी बार वे होंगी उनके संपूर्ण रूप में: जब तुम उदास निराश होते हो कि तुम खुशी के मारे पागल होने जैसा अनुभव करते हो। इन सारे रूपों पर ध्यान करना होता है---क्योंकि पतंजलि कहते हैं, 'ये सारे रूप अस्तित्व रखते हैं अजागरूक होने से; तुम जागरूक नहीं होते।'
पहले तो होश रखो सतही घटनाओं का: लोभ, क्रोध, घ्रणा; फिर और गहरे जाओ, और तुम अनुभव कर पाओगे बार-बार दुहरायी जाने वाली घटना को। दोनों जुड़ी होती हैं। जरा और गहरे जाओ, ज्यादा सचेत होओ, और तुम अनुभव करोगे बहुत क्षीण घटना तुम्हारे भीतर है, छाया की भांति है, लेकिन तो भी किसी भी समय वह ठोस रूप पा सकती है। तो ऐसा घटता है किसी भी धार्मिक व्यक्ति के साथ---कि एक सुंदर स्त्री आती है और सारी पावनता तिरोहित हो जाती है; एक क्षण में ही। वह वहाँ थी क्षीण रूप में। या वह मौजूद रह सकती है बीज रूप में। बीज रूप को जान लेना सबसे ज्यादा मुश्किल बात है। क्योंकि वह प्रस्फुटित नहीं हुआ होता। इसके लिये चाहिए पूरा होश।
और पतंजलि की तो संपूर्ण विधि ही है जागरूकता की: ज्यादा और ज्यादा जागरूक हो जाओ। तुम ज्यादा जागरूक हो जाओगे यदि तुम सहज-संयमी हो जाते हो, सहज-सरल हो जाते हो। तुम ज्यादा होश पा जाओगे और स्व-स्मरण संभव हो जायेगा। और स्व-स्मरण से अहं गिर जाता है और व्यक्ति समर्पित अनुभव करता है और समर्पित होना सम्यक् मार्ग पर होना है।
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अभी बस इतना ही।
ॐ
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तप:स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोग:।।१।।
क्रियायोग एक प्रायोगिक, प्राथमिक योग है और वह संगठित हुआ है---सहज संयम (तप), स्वाध्याय और ईश्वर के प्रति समर्पण से।
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समाधिभावनार्थ: क्लेशतनूकरणार्थश्च।।२।।
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क्रियायोग का अभ्यास, क्लेश को घटा देता है और समाधि की ओर ले जाता है।
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अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशा: क्लेशा:।।३।।
दुख उत्पन्न होने के कारण हैं: जागरूकता की कमी, अहंकार, मोह, घृणा, जीवन से चिपके रहना और मृत्यु-भय।
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अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम्।।४।।
चाहे वे प्रसुप्तता की, क्षीणता की, प्रत्यावर्तन की या फैलाव की अवस्थाओं में हो, दुख के दूसरे सभी कारण क्रियांवित होते हैं---जागरूकता के अभाव द्वारा ही।
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ये तीन चरण दुख घटाते हैं और तुम्हें समाधि की ओर ले जाते हैं, परम की ओर, जिसके बाद कोई चीज अस्तित्व नहीं रखती है। जब तुम परमात्मा के प्रति समर्पित होते हो, परमात्मा हो जाते हो; वही होती है समाधि।
दुख उत्पन्न होने के कारण हैं: जागरूकता की कमी, अहंकार, मोह, घृणा, जीवन से चिपके रहना और मृत्यु-भय।
वस्तुतः केवल अहंकार ही होता है कारण। आत्म-जागरूकता की कमी अहंकार है। तुम स्वयं से कभी मिले ही नहीं; और तुम सोचते हो कि तुम हो। यह बात सब प्रकार के दुख निर्मित करती है।
'...अहंकार, उन चीजों के प्रति आकर्षण है जो व्यर्थ होती हैं, द्वेष, घृणा---जो कि मोह का, दूसरा छोर है---जीवन से चिपकना और मृत्यु-भय।'
तुम जीवन से चिपकते हो क्योंकि तुम जानते नहीं कि जीवन क्या है। जीवन शाश्वत है---क्यों चिपकना? वह चलता जा रहा है और कभी ठहर सकता नहीं । तुम उससे चिपककर अनावश्यक रूप से स्वयं को तकलीफ देते हो।
जीवन अनन्त है। कोई मरता नहीं है कभी; कोई मर नहीं सकता है कभी। जो कुछ अस्तित्व में है वह अस्तित्व रखेगा, वह जा नहीं सकता है अस्तित्व के बाहर। अस्तित्व समग्र होता है। हर चीज बनी रहती है---भाव-दशाएं बदलती हैं, आकार बदलते हैं, नाम बदलते हैं।
यही है जिसे हिंदू कहते हैं---'नामरूप'। रूपाकार और नाम बदल जाते हैं, वरना तो हर कोई बना रहता है, हर चीज बनी रहती है।
दुख उत्पन्न होने के कारण हैं: जागरूकता का अभाव, अहंकार, मोह, घृणा, जीवन से चिपके रहना और मृत्यु-भय।
चाहे वे प्रसुप्तता की, क्षीणता की, प्रत्यावर्तन की या फैलाव की अवस्थाओं में हो, दुख के दूसरे सभी कारण क्रियान्वित होते हैं जागरूकता के अभाव द्वारा ही।
दुख के कारणों के बहुत से रूप हो सकते हैं; वे बीजों के रूप में हो सकते हैं। तुम अपना दुख उठाए चल सकते हो बीज रूप में। किसी खास स्थित में पानी धूप पाकर वह बीज प्रस्फुटित हो जायेगा। तो कयी वर्षों तक तुम्हें कोई लालच नहीं और अचानक एक दिन जब ठीक अवसर आ बनता है, तो लालच मौजूद हो जाता है।
प्रेम में तुम सुख अनुभव करते हो, घृणा में तुम दुख अनुभव करते हो; लेकिन प्रेम और घृणा एक ही ऊर्जा की बारी-बारी से आने वाली दो घटनाएँ हैं। कयी बार वे होंगी उनके संपूर्ण रूप में: जब तुम उदास निराश होते हो कि तुम खुशी के मारे पागल होने जैसा अनुभव करते हो। इन सारे रूपों पर ध्यान करना होता है---क्योंकि पतंजलि कहते हैं, 'ये सारे रूप अस्तित्व रखते हैं अजागरूक होने से; तुम जागरूक नहीं होते।'
पहले तो होश रखो सतही घटनाओं का: लोभ, क्रोध, घ्रणा; फिर और गहरे जाओ, और तुम अनुभव कर पाओगे बार-बार दुहरायी जाने वाली घटना को। दोनों जुड़ी होती हैं। जरा और गहरे जाओ, ज्यादा सचेत होओ, और तुम अनुभव करोगे बहुत क्षीण घटना तुम्हारे भीतर है, छाया की भांति है, लेकिन तो भी किसी भी समय वह ठोस रूप पा सकती है। तो ऐसा घटता है किसी भी धार्मिक व्यक्ति के साथ---कि एक सुंदर स्त्री आती है और सारी पावनता तिरोहित हो जाती है; एक क्षण में ही। वह वहाँ थी क्षीण रूप में। या वह मौजूद रह सकती है बीज रूप में। बीज रूप को जान लेना सबसे ज्यादा मुश्किल बात है। क्योंकि वह प्रस्फुटित नहीं हुआ होता। इसके लिये चाहिए पूरा होश।
और पतंजलि की तो संपूर्ण विधि ही है जागरूकता की: ज्यादा और ज्यादा जागरूक हो जाओ। तुम ज्यादा जागरूक हो जाओगे यदि तुम सहज-संयमी हो जाते हो, सहज-सरल हो जाते हो। तुम ज्यादा होश पा जाओगे और स्व-स्मरण संभव हो जायेगा। और स्व-स्मरण से अहं गिर जाता है और व्यक्ति समर्पित अनुभव करता है और समर्पित होना सम्यक् मार्ग पर होना है।
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अभी बस इतना ही।
ॐ
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जय जय श्रीराम।।
ReplyDeletejai jai sri-ram.
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