पतंजलि योगसूत्र। पहली बैठक।

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तप: स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोग:।।१।।

क्रियायोग एक प्रयोगिक, प्राथमिक योग है और वह संघटित हुआ है---सहज संयम (तप), स्वाध्याय और ईश्वर के प्रति समर्पण से।
. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . (योगसूत्र, साधनपाद)
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पतंजलि पर चर्चा से पहले कुछ बातें कर लेना जरूरी लग रहा है। क्योंकि यह व्याख्या पहले की गयी व्याख्याओं से अलग हट के हो सकती है।
सामान्य मनुष्यता को दो मूलभूत प्रकारों में बांटा जा सकता है: एक तो है पर-पीड़क और दूसरा है स्व-पीड़क। पर-पीड़क आनंद पाता है दूसरों को पीड़ा पहुंचाकर और स्व-पीड़क आनंदिद होता है स्वयं को पीड़ा पहुंचा कर। निसंदेह दूसरों को पीड़ा देने वाला आकर्षित होता है राजनीति की ओर। वहां संभावना होती है, दूसरों को उत्पीड़ित करने का अवसर होता है। या वह आकर्षित होता है वैज्ञानिक खोज की ओर, विशेषकर चिकित्सा-शास्त्र की खोजकी ओर। वहां प्रयोग के नाम पर एक संभावना होती है, मासूम जंतुओं को यातना देने की, रोगियों, मुर्दा और जीवंत शरीरों को उत्पीड़ित करने की। देश के नाम पर, समाज, राष्ट्र, क्रांति के नाम पर, सत्य की खोज के नाम पर, दूसरों को सुधारने के नाम पर, पर-पीड़क सदा किसी न किसी को उत्पीड़ित करने के आवसर की खोज में रहता है।

पर-पीड़क धर्म की ओरबहुत आकर्षित नहीं होते हैं। दूसरे प्रकार के लोग आकर्षित होते हैं धर्म की ओर, वे हैं स्व-पीड़क। वे स्वयं को पीड़ा दे सकते हैं। वे बन जाते हैं महात्मा, वेबन जाते हैं बड़े संत; और वे सम्मान पाते हैं समाज के द्वारा क्योंकि वे स्वयं को पीड़ा पहुंचाते हैं। एक पक्का स्व-पीड़क सदा ही सीधे तौर पर सरकता है धर्म की ओर, बिलकुल वैसे ही जैसे कि एक पक्का पर-पीड़क सरकता है राजनीति की ओर। राजनीति धर्म हैं पर-पीड़क की, धर्म राजनीति है स्व-पीड़क की। लेकिन यदि एक स्व-पीड़क बहुत निश्चित नहीं होता, तब वह ढूंढ़ लेता है दूसरे वैकल्पिक मार्ग। वह बन सकता है कलाकार, चित्रकार, कवि, और स्वयं को पीड़ा पहुंचाए जा सकता है---कविता, साहित्य, चित्रकला के नाम पर।

सुना होगा एक बड़े डच चित्रकार, विन्सेंट वानगाग का नाम। वह पक्का स्व-पीड़क था। यदि भारत में पैदा हुआ होता तो बन गया होता महात्मा गांधी; लेकिन वह बना चित्रकार। कुछ ज्यादा धन नहीं था उसके पास। उसका भाई उसे जीने मात्र जितना पैसा दिया करता था। सप्ताह के सात दिनों में से, वह केवल तीन दिन भोजन करता, और सप्ताह के बाकी चार दिन वह चित्र बनाने के खातिर उपवास रखता।

वह एक स्त्री के प्रम में था। लेकिन स्त्री का पिता उससे मिलने की इजाजत न देता था उसको। अत: उसने जलती लौ पर रख दिया अपना हाथ और बोला, 'मैं जलती लौ पर ही रखे रखूंगा अपना हाथ, जब तक कि आप मुझे उससे मिलने न दोगे।' उसने जला डाला अपना हाथ।
एक वेश्या ने कहा उससे, 'तुम्हारे कान बहुत सुंदर हैं', क्योंकि प्रशंसा करने को और कुछ था ही नहीं उसके चेहरे में। वह घर वापस गया, अपना एक कान काट दिया छुरी से, उसे पैकेट में रखा; बहते खून सहित ही वापस गया उसके पास और कान स्त्री के सामने यह कहते हुए पेश कर दिया कि 'तुमने इसे इतना ज्यादा पसंद किया कि इसे मैं तुम्हें उपहार स्वरूप देना चाहूँगा।'
उसने चित्र बनाना जारी रखा फ्रांस के सबसे ज्यादा गरम भाग आर्लीज में, जब कि गरमियों में सूरज बहुत तप रहा था। हर एक ने कहा उससे, 'तुम बीमार पड़ जाओगे, सूरज बहुत आग बरसा रहा है', लेकिन सारा दिन, विशेष कर जब कि सूर्य सबसे ज्यादा तप्त रहता, पूरी भरी दुपहरी में, वह मैदानों में खड़ा रहता चित्र बनाते हुए! बीस दिनों के भीतर वह पागल हो गया। वह युवा था, तैंतीस या चौंतीस का ही था, जब उसने मार डाला खुद को, आत्महत्या कर ली।

परंतु चित्रकला, कला, सौंदर्य के नाम पर, तुम कर सकते हो स्वयं को पीड़ित। ईश्वर के नाम पर, प्रार्थना के नाम पर, साधना के नाम पर, तुम कर सकते हो स्वयं को पीड़ित। तुम इस ढंग को बहुत ही प्रबल पाओगे भारत में: कील, कांटों की शैया पर लेटे, महीनों-महीनों उपवास करने वालों को। ये व्यक्ति बीमार हैं; उन्हें जरूरत है मानसिक इलाज की। लेकिन तो भी हजारों आकर्षित हो जाते हैं उनकी तरफ।

तुम्हारे सारे राजनेताओं को, रूडोल्फ हिटलर या जोसेफ स्टालिन को या माओत्से तुंग को जरूरत है मानसिक इलाज करवाने की। और तुम्हारे सारे महात्माओं को भी जरूरत है इलाज की। क्योंकि वह व्यक्ति जो स्वयं को या दूसरों को पीड़ित करने में रुचि रखता है, बीमार होता है, गहन तौर पर बीमार होतस है। जब तुम स्वास्थ्यपूर्ण होते हो तब तुम दूसरों को पीड़ित करना नहीं चाहते; तब तुम आनंदित होना चाहते हो। तुम आनंद के अतिरेक से, उमड़ाव से भरे होते हो। स्वस्थता एक उत्सव है। अस्वस्थता है---दूसरों को या स्वयं को पीड़ित करना।
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पतंजलि न तो पर-पीड़क थे और न ही स्व-पीड़क। वे किसी आंतरिक अस्वस्थता से रहित, मनोवैज्ञानिक समस्याओं से रहित, मानसिक ग्रस्तताओं से रहित, संपूर्णतया पूरे, एकजुट व्यक्ति थे।
पतंजलि के योगसूत्र सबसे अधिक व्याख्यायित चीजों में से हैं; वे एकदम से भरे हुए हैं महत्वपूर्ण अर्थ से; वे बहुत गहन रूप से अर्थपूर्ण हैं। लेकिन उन पर व्याख्या करने के लिये पतंजलि कहां मिलते हैं किसी को? कहां मिलता है कोई व्यक्ति जो किसी ढंग से अस्वस्थ न हो?

शायद तुम्हें भी उस दो हजार साल पहले यूनान में पैदा हुए एपीकुरस से कुछ घनिष्ठता अनुभव हो सकती है। कोई उसे धार्मिक नहीं मानता। वह धार्मिक व्यक्ति से एकदम विपरीत था। लोग सोचते हैं जो सर्वाधिक नास्तिक व्यक्ति हुए हैं वह उनमें से एक था। वस्तुतः वह सहज रूप से धार्मिक था। धर्म घटा था उसमें। यह उक्ति: 'खाओ, पीओ और आनंद मनाओ', आयी है एपीकुरस से।
वस्तुतः एपीकुरस बहुत ही आडंबररहित सरल जीवन जिया। महावीर और बुद्ध भी उतने सरल-सहज न थे जितना कि एपीकुरस क्योंकि उसकी सादगी परिष्कृत थी; महावीर और बुद्ध ने तो उस सादगी के लिये प्रयास किया था, उसका अभ्यास किया था। महावीर नग्न थे, खाली, उन्होंने त्याग दिया था सब कुछ, तो भी त्यागा तो था! वह बात सहज स्वाभाविक तो न थी।
एपीकुरस एक छोटे से बगीचे में रहता था। वह बगीचा 'एपीकुरस का बगीचा' नाम से जाना जाता था। उसके पास अरस्तू की भांति कोई अकादमी न थी या कि प्लेटो की भांति कोई स्कूल न था; उसके पास एक बगीचा था। वह बगीचे में रहता था कुछ मित्रों के साथ। वह शायद पहला कम्यून था। वे बस वहां रह रहे थे---विशेष रूप से कुछ न करते हुए, बगीचे में काम करते हुए, मात्र जीने के लिये पर्याप्त था उनके पास।
ऐसा कहा जाता है कि राजा वहां आया निरीक्षण करने को और सोच रहा था कि यह आदमी जरूर ऐश्वर्य में रहता होगा, क्योंकि उसका आदर्श वाक्य था: 'खाओ, पीयो और आनंद मनाओ।' लेकिन जब वह वहां पहुंचा तो उसने बगीचे में काम करते हुए बहुत सीधे-सादे लोगों को देखा। शाम के भोजन में रूखी रोटी और थोड़ा सा दूध, खाते देख कर राजा रो पड़ा। क्योंकि वह तो वहां उसकी निंदा करने गया हुआ था। एपीकुरस बोला, 'तुमने देखा, हम यहां चौबीसों घंटे प्रशंन्न रहते हैं। यदि तुम प्रशंन्न होना चाहते हो तो तुम्हें सहज होना होगा, क्योंकि जितने जटिल होते हो तुम, उतने दुखी हो जाते हो तुम। हम सहज स्वाभाविक हैं इसलिये नहीं कि हम परमात्मा को खोज रहे हैं, हम सहज हैं क्योंकि सहज होना ही सुखी, प्रशंन्न होना है।'
इस सरलता में धर्म घटता है स्वाभाविक रूप से। तुम ईश्वर के बारे में सोचते नहीं, ऐसी कोई जरूरत नहीं होती; जीवन ही ईश्वर होता है। आकाश की ओर हाथ जोड़ प्रार्थना नहीं करते; वह मूढ़ता है। तुम्हारा सारा जीवन सुबह से लेकर सांझ तक एक प्रार्थना होता है। प्रार्थना एक भाव है: तुम उसे जीते हो, उसे तुम कोई क्रिया नहीं बनाते।
एपीकुरस समझ सकता था पतंजलि को। पर तुम्हारी व्याख्यायें ठीक इसके विपरीत पड़ती हैं।

क्रियायोग एक प्रयोगिक, प्राथमिक योग है और वह संघटित हुआ है---सहज-संयम (तप), स्वाध्याय और ईश्वर के प्रति समर्पण से।
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।।ॐ।।
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